Sunday, 8 March 2026

धडपड ही आनंदासाठी!

 जीवाची धडपड ही सुखासाठी असते असं म्हणतात, पण कोणत्याही जीवाची धडपड ही खरं तर सच्चिदानंदासाडीच असते पण त्याला ते समजत नाही.
तुम्ही म्हणाल कसं! तर झवून घेण्यात/झवण्यात काही सुख असतं का! पोरांना जन्म देण्यात काही सुख असतं का! तर नाही, दुःखच असतं. पण जीवांना त्यातून क्षणिक का होईना आनंद मिळतो.
आता राक्षस जन मांसाहार करतात. हाडकं चघळण्यात कसलं आलंय सुख! पण त्यानं 'बल' वाढेल आणि आपण अजून आनंद घेऊ असं बिचाऱ्यांना वाटत असतं. आपण धर्म नाकारतो याचाही काही जणांना आसुरी आनंद मिळत असतो.
मी आता हे लिहित आहे, प्रेषणार आहे ते ही आनंदासाठीच. पण हा कोणताही आनंद सच्चिदानंद नाही. तो सत्य ज्ञानानेच मिळत असण्याची शक्यता आहे(माझा विश्वात नाही).
मराठी संत: संत की वैज्ञानिक!
महाराष्ट्र, मराठी भाषेला फार मोठी संत साहित्यिची परंपरा आहे ज्ञानदेवांनी भावार्थ दिपिका लिहीली, तुकारामांनी गाथा लिहिली, रामदासांचा दासबोध, एकनाथांनी एकनाथ भागवत ही ठळक उदाहरणं! या व्यतिरिक्तही अनेक संत अहेत. पण मी इतरांचं फारसं काही ऐकलं पण नाही. तर या सर्व ग्रंथात (मनो)वैज्ञानिक सिद्धांत आहेत. म्हणजे हे केवळ संत नसून वैज्ञानिक पण आहेत.

Saturday, 28 February 2026

परमात्मानुभव

शीर्षक जरी परमात्मानुभव दिलं असलं तरी एवढं मोठं जग आहे म्हणजे कुणी तरी त्याला निर्माता/ती असलं पाहिजे असले फालतू सिद्धांत(?) मांडण्याकरिता हे प्रेषण नाही. जे मानवी तर्क बुद्धीच्या 'पलिकडे' आहे त्याला तर्क बुद्धीनं कसं सिद्ध करणार!
डार्विनचा विकासवादाचा तथाकथित सिद्धांत मला नाकारायचा नाही. कारण जीवनाची उत्पत्ती कशी 'होते' याबद्दल वेद-पुराणातील मतांशी सुसंगत गृहीतकं आहेत ती! पण मला तुमच्या बुद्धीला थोडा ताण द्यायचा आहे. जरा विचार करा! समजून चलू काही पद्म वर्षांपूर्वी जीवन अस्तित्वात आलं, आणि काही लक्ष वर्षांनी ते संपेल. पण मग त्यापूर्वी आणि त्यानंतर काय! म्हणून आपलं भारतीय तत्त्वज्ञान सांगतं ब्रह्म अनादी अनंत आहे. चार युगं आहेत आणि ती सतत पुनरावृत्त होत आहेत. यापेक्षा तर्क पूर्ण मत काय असू शकेल!
धन्यवाद!

Sunday, 22 February 2026

परमात्मविचार!

!मला वाटतं आत्मा, परमात्मा हे शब्द कुणी तरी गुजराथी चिंतकांनी दिले असावेत. आत मा(मध्ये) असतो तो आत्मा असा तो विचार असावा. असो. मला आता त्यावर जास्त बोलायचं नाही आहे.
तर आत्मा म्हणजे काय तर सर्वांमध्ये असणारं एक तत्त्व! परमात्मा म्हणजे समुच्चित आत्मा! त्याला ब्रह्म किंवा चैतन्यही म्हटलं जातं. आत्मा हे आंग्ल भाषेतील सौल(soul)हून भिन्न आहे. सौल केवळ हुमन बेइंगमधे असतं असं त्यांचं(अब्राह्मिकांचं) मत आहे. पण चैतन्य निर्जीव समजल्या जाणाऱ्या गोष्टींचाही असतं. ही त्याची विशेषता आहे. मलं-मूत्र, निर्जीव(?) शरीर यांमध्ये ही चैतन्य असतंच पण आपण नाव दिलेलं चैतन्य नसतं.
मला वाटतं एवढं पुरेसं आहे. धन्यवाद!

Thursday, 25 December 2025

अद्वैतवाद: महान तत्वज्ञान!

मेरे जानकारी नुसार अद्वैतवाद के प्रथम प्रतिपाता आद्य शंकराचार्य हैं। ये एक महान तत्वज्ञान है।
अद्वैतवाद कहता हैं ब्रह्म सत्यं, जगं मिथ्या। इसका अर्थ कुछ जन करते हैं कि केवल ब्रह्म सत्य हैं और जग नहीं ही है। परंतु ऐसा नहीं हैं। सच्चा सत्य वहीं जो शाश्वत हैं। मिथ्या का अर्थ है जो सदा के लिए एक जैसा नहीं है, परिवर्तन हो रहा है। कुल मिलाकर हम कह सकते है कि परिवर्तनशील जग में कुछ तो है जो शाश्वत हैं और ये संपूर्ण तर्कसुसंगत बात है, तर्कविहीन नहीं।
परंतु इसका अर्थ ये नहीं कि 'स्वरूपों' में कुछ भेद नहीं। जब तक जग है, स्वरुपोंमे भेद रहेगा ही। और मिथ्या हैं तो भी जग रहेगा ही।
अगर मेरे इस निवेदन से किसी 'सच्चे' सनातनी की भावनाएं आहत होती हैं तो पूर्ण मन-विचार से क्षमा प्रार्थी हूं।
धन्यवाद!

Thursday, 11 December 2025

तिसरी आंख!

पुराणों में वर्णन हैं कि शिव को तीन आंखें हैं। दो खुलीं और एक बंद रहतीं हैं। वो तब ही खुलतीं है जब शिवजी क्रोधित होते हैं। इस पर विधर्मी और तथाकथित अंधश्रद्धा निर्मूलक, सेकुलर हमारा(हिंदू ओ का) मजाक उड़ाते हैं। और अक्सर हमारे पास कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि हम अभ्यास नहीं करते हैं, चिंतन नहीं करते हैं।
पुराणों में जो वर्णन हैं वो आलंकारिक है। हमें समझाते सोपा हो इसलिए! ये तिसरी आंख हमारे पास भी है। परंतु वो दैहिक नहीं है, बौद्धिक है। वो आंख हैं सद्सदविवेकबुद्धि! दो हम में अवश्य होती है परंतु बहुतांश जन उपयोग नहीं करते याने खोलते नहीं। ये आंख जब खुलतीं है तब अज्ञान और मोह को दूर करतीं हैं। याने कि भस्म!
कामदहन क्या हैं!
पुराणों में शिव जी द्वारा कामदेव को जलाने का वर्णन हैं। अति काम वो किसी भी रूप में ही मनुष्यों के जीवन से सुख-शांति, आनंद छीन लेता हैं। कामी मनुष्य का घर अगर चांर कमरों का हों तो वो सोचेगा और दो कमरे हो। छे कमरों का भी हो जाए तो वो वहीं सोचेगा। उसके पास दुचाकी हो तो वो सोचेगा स्वयंचालित हों जाएं। स्वयंचालित हों जाएं तो वो सोचेगा अपनी चतु:चक्री हो जाएं। ऐसे ही काम, वासनाएं बढ़ती ही रहती है। उसे सद्सदविवेकबुद्धि से सिमित करना ही शहाणपण है।

Monday, 1 December 2025

षड्रिपू और आरोग्य

भारतीय तत्वदर्शियोने षड्रिपू(मनुष्य के छे आंतरिक शत्रु) बताएं है। वो है काम(वासनाएं), क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर! ये मानसिक ही नहीं शारीरिक व्याधियां भी उत्पन्न करने है। आज मैं उस विषय में बताने का प्रयास कर रहा हूं।
काम: यद्यपि काम को शत्रु बताया है, इसके बिना कुछ नहीं होता। सिमित हो तो ये भगवान है। परंतु अधिक काम रक्त गति बढ़ाता है, असंतुष्ट बनाता है, क्रोध उत्पन्न करता हैं। ये मन को चंचल भी बनाता है।
क्रोध: ये भी रक्त गति बढ़ाता है।
लोभ: ये पचन क्रिया बिगाड़ता है। कर्करोग(कैंसर) उत्पन्न करता है। मधुमेह उत्पन्न करता है।
मोह: मोह मनकों चंचल बनाता है।
मद: जब काम की पूर्ति होती रहती है तब मद होता है। ये स्वयं ही एक मानसिक व्याधी है।
मत्सर: दुसरो का अच्छा हुआ बुरा लगना ये मत्सर है। ये भी एक मानसिक व्याधी है।
आपके कुछ अच्छे अभिप्राय आये ये 'काम' मुझे है।

Wednesday, 22 October 2025

पुराण कथाएं:'दिव्य संकल्पनाएं!

पुराण कथाओं के बारे जनों कि दो सोचें है। कुछ(विशेषतः (दु:)बुद्धिवादी इसे मात्र कल्पनाएं मानते हैं, तो कुछ(अंधविश्वासी) इसे 'पूर्ण' सत्य(?) घटनाएं मानते हैं। परंतु पुराण ना ही मात्र कल्पनाएं हैं और ना ही 'सं'पूर्ण इतिहास। मेरे विचार से पुराण सच्चे समाज हितैषी ऋषियों कि 'इतिहासयुक्त' दिव्य कल्पनाएं हैं।
उदाहरण के लिए आज गुरूवार है तो दत्तजन्म कि कथा लेते है। इसमें वर्णित है कि(जो तथाकथित कथावाचक हमें समझाते है) नारद का गुणगान सुनकर देव पत्नीयों में 'अत्रि' ऋषि की पत्नी 'अनसूया' के प्रति 'असूया(मत्सर)' निर्माण हुआ और जो आगे है वो। इस कथा पे (कु)बुद्धिवादी) कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है! ये अशक्य है! तों अंधविश्वासी कहेंगे ऐसा हुआ ही है। परंतु मुझे ये महत्वपूर्ण नहीं लगता ये हुआ या नहीं हुआ। मुझे ये महत्वपूर्ण लगता है कि इसमें बोध क्या है। और ये कथा पातिव्रत 'धर्म' के 'सत्संकल्प' को स्पष्ट करती है। पातिव्रत 'धर्म' शारीरिक क्रियाओं से निगडित नहीं है। पातिव्रत 'धर्म'है पती के प्रति प्रेम, निष्ठा और विश्वास रखना। उसके 'संत्' संकल्प में सहभागी होना। उसके धर्म में 'पुरा' समर्पित होना। इसीलिए (कधा के अनुसार)अनसूया नग्न हो के भिक्षा देने के लिए तैयार होती है।
मन:पूर्वक पढ़ने के लिए धन्यवाद! जय गुरुदेव दत्त!