वैसे तो अंधभक्त इस शब्द में कोई दम नहीं है। भक्ति एक महान और व्यापक तत्व है। परंतु इनकी सोच 'इतनी संकिर्ण' है ये जो कुछ करते है उसे ही भक्ति समझते हैं। इन्हें यह ज्ञात ही नहीं कि सच्ची भक्ति के लिए पुरुषार्थ, 'अध्ययन-अभ्यास', ज्ञात और तर्कसंगत विचारशक्ति आवश्यक है। इसके अभाव से जब ये अभक्ति-अज्ञान, नास्तिको के 'कुतर्क' का विज्ञान, शास्त्र के ज्ञान और तथा तर्क से खंडन नहीं कर सकते हैं तो 'उन्ही के तरह जाहिल बन के' हाथघाई पर आते हैं।
इस समय इतना ही! 'ध्यान से पढ़ने वालों का' धन्यवाद!